Saturday, November 30, 2013

आप

आप इंसान तो हो नहीं सकतीँ
मेरे तजुर्बे के हिसाब से तो बिलकुल भी नहीं
क्यूंकि इंसान होने के लिए जो ज़रूरी ऐब हैं
वो तो आप में हैं ही नहीं.

आप फरिश्ता भी नहीं हो सकतीं
क्यूंकि उसके लिए तो ख़ुदा के बड़े करीब होना पड़ता है
और मैं, कम से कम अपनी सोच में तो, आपको बाँट नहीं सकता

आप का होना शायद सिर्फ मुक़ाम-ए-मोहब्बत ही हो सकता है
जहां आप सिर्फ वो ना पा सकने वाली मंज़िल हो सकती हैं
जिसकी कोशिश में बस होना होता है, पहुचना नहीं

Friday, May 10, 2013

कवि


So this one is an attempt to understand how poets may be viewed from the perspective of a now scorned admirer. It may also be construed to be the standard view of people who don't have an appetite for poets or poetry.
Frankly speaking, I don't know on which side it leans.

कवि हैं ये, जीवित अजीवित का सूक्ष्मता से अध्ययन करते
अफसाने बुनते हुए हक़ीक़त-ए-आम के, सिर्फ नज़र नहीं एहसास को बयान करते ये

भावार्थी शब्दों की उलट पुलट से कुछ गहरा ज़ाहिर करते
और गहरा ग़र सोच में सुर्ख़ भी हुआ, तो यकीनन तुम्हारे ताज-ए-दिल पे दस्तक करते ये

जो नहीं समझे तुम कुछ, तो इस कमज़ोरी पर एक सूफ़ियाना सा अफसोस जताते
और इंसानी अक्ल की इस हद से मंत्रमुग्ध होकर,इस पर भी कुछ दार्शनीय सा लिखते ये

क्या आशा क्या जीवन और क्या हो निश्चय, इन चिरकालिक गुत्थियों पे मनन करते
अपने और तुम्हारे लिये नहीं तो अजन्मी पीढियों के लिये जीवन मार्ग प्रशस्त करते ये

सिसकते घनघोर अन्याय पर, विस्मित होते हर सामाजिक अध्याय पर
और अपने इन बुद्धिजीवी निष्कर्षों से तुमको यक़ीनन टटोलते ये

और कवि ही क्यूं, ये तो किसी भी भेस के मोहताज नहीं
तुम्हारे पथ प्रदर्शक, तुम्हारे अख़लाक़ के चिर रक्षक ये