Friday, November 25, 2011

एक कविता

कुछ छलकती सी, कभी बहती सी, कभी सिमटती सी,
ख़यालों को शब्दों से समझने की कोशिश में, एक कविता मेरे मन से निकल रही है

कब होता है इसका आना, क्यूँ होता है इसका आना,
अपने उद्गम के असमंजस में मुझे डाले हुए, एक कविता मेरे मन से निकल रही है

क्या इसके शब्द बेमानी हैं, क्या इसका वजूद असल में फ़ानी है,
या शायद रूह-ए-मिल्लत से मुझे जोड़ने की कोशिश में, एक कविता मेरे मन से निकल रही है

हम क्यूँ ये जीवन पाते हैं, और पाकर इसका क्या कर जाते हैं,
आत्म संवाद की इस अधूरी कोशिश में, एक कविता मेरे मन से निकल रही है

जब ये बातें मेरी खुद से हैं, तो फिर मुख़ातिब तुमसे क्यूँ हूँ मैं,
तुम्हे भी एक दिन समझाने की हसरत लिए, एक कविता मेरे मन से निकल रही है

आगे कुछ और क्या बोलूं मैं, नश्तर से तस्वीर क्या उकेरुं मैं,
बे-लहू एक कोरे पन्ने पर कुछ बनाने के लिए, एक कविता मेरे मन से निकल रही है

Tuesday, October 4, 2011

ज़िद

जो होती इतनी ही ख़बर अपनी, तो क्यूँ ज़िद में ज़िन्दगी गवांते
ख़ाक पर सराबोर-ए-नूर ना होकर, सारे सितारों को ही तोड़ लाते

होते मंजिल की फ़िराक में हरदम, ख्वाहिशों के पुल बनाते
गर्द भरी तंग गलियों से भी हम मुरीद, उम्मीदों के कारवां ले जाते

कामयाबियों की इमारतों में बसते, दश्त पर नज़र ना फिराते
इश्क-ए-ख़याल की बेज़ा दुनिया में, क्यूँ शब्-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल बिताते

बचपन की उस अल्हड़ ख्वाहिश की तरह, बड़ा होने के सपने सजाते
क्यूँ अपने जवान अरमानों में, उसी बचपन को ढूँढ़ते रह जाते

किसी के इंतज़ार-ए-दीद में पड़ते, आसुओं से वुज़ू फ़रमाते
नारसाई के घुप्प अंधेरों में, हम क्यूँ चिताओं से रोशनी पाते

जो होती इतनी ही ख़बर अपनी, तो क्यूँ ज़िद में ज़िन्दगी गवांते
ख़ाक पर सराबोर-ए-नूर ना होकर, सारे सितारों को ही तोड़ लाते

Meanings:
ख़ाक : Ground/Earth
सराबोर-ए-नूर : bathed in light
गर्द : dirt
मुरीद : committed one(used as a pen name here)
दश्त : barren land
इश्क-ए-ख़याल : love of thought
बेज़ा : worthless/lifeless
शब्-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल : nights, days, months, years
इंतज़ार-ए-दीद : wait of a glimpse
वुज़ू : act of cleaning eyes and face before prayer
नारसाई : inaccessibility

(Another one of my attempts at poetry. Reader's comments are welcome. Please correct me if my Urdu usage is wrong, as I've been self-taught the language, and as is the case with languages, the grammar is the last thing one learns!)

Saturday, May 14, 2011

एक विश्व विजेता की ख़ुशी

(Alright, I'm back to doing what I love the most! I wrote this piece at the pre- semifinal time of the Cricket World Cup. Modified the initial draft today and publishing it only now. This is my first attempt at writing full length Hindustani poetry. I hope it is not too heavy a attack on the readers' reason or frame of mind!)

अभी कुछ वक़्त पहले किसी को भविष्यवाणी करते हुए सुना की इंडिया जीत रहा है

नयेपन का आडम्बर ओढ़ कर, नाम की डिगरी खरीदकर, तिरंगा सीने से जकड़े हुए
जब उस युवा को भी देखा तो लगा की इंडिया जीत रहा है.

दिन भर पत्थर तोड़ कर, मिली कौड़ियों को जोड़ कर, भाड़े के ट्रांसिस्टर को अपने कान से सटाए हुए
जब उस मजदूर को भी देखा तो लगा की इंडिया जीत रहा है.

बचपन को पीछे छोड़ कर, मासूमियत के टुकड़े जोड़ कर, ट्राफ्फिक लाइट में नन्हे हाथों से 'तिरंगा' बेचते हुए
जब उस बच्चे को भी देखा तो लगा की इंडिया जीत रहा है.

पुरखों की ज़मीन बेचकर, अपनों से नाता तोड़कर, गाँव की नरमी को शहर की गरमी से तौलते हुए
जब उस टी-शर्ट वाले को भी देखा तो लगा की इंडिया जीत रहा है.

खैर, इंडिया जीता भी, वो युवा चीखा भी,
वो मजदूर हँसा भी, वो बच्चा भी खिलखिलाया,
और वो किसान मुस्कुराया भी,
और 'खुशियों' के इस आलम में शायद इसलिए हर ज़हन को लगा की वाकई इंडिया जीत गया है.