Monday, July 30, 2012

लफ्ज़


मुझसे ज़्यादा ख़ुशनसीब तो मेरे ये लफ्ज़ हैं,
कल तेरे पहलू में ये ख़ुद को पायेंगे

तेरी नज़रें फिरेंगी इन पर हौले हौले,
तेरे चेहरे के तबस्सुम पे ये ग़श खायेंगे

क़ासिद के इंतेज़ार में जब होगा दिल टूटने को बेबस,
तेरे जवाबी लफ़्ज़ों में, हमजोलियों को मिल, शायद इतराएँगे

रखना इन्हें सम्हाल कर ऐ मेरे दोस्त,
कुछ वक़्त में बस ये ही तेरे काम आयेंगे

बदल जाऊं मैं भले ही कोई बहाना कर के,
बचे हुए, मेरे, शायद यही रह जायेंगे

Friday, January 20, 2012

क़ैद

अगर हमें शीशा ही दिखे हर दीदार में,
तो क्यूँ नयी सूरत दिखे हर अक्स-ए-रूह-ए-यार में

जिसे देखो वो नयी तसवीर बना कर बैठे मेरी,
पहचान जैसे ग़ुम सी गयी हो दलीलों के बाज़ार में

कहा भी की नुमाया है दिल-ए-हाल मेरा,
फिर क्यूँ हमेशा देखते हो मुझे माज़ी-ए-बय़ार में

क्यूँ समझते हो की क़ैद-ए-मज़ामी ही पाओगे मुझको,
इंसान हूँ, रुका हुआ अश्क नहीं अबसार में

बेसब्र होकर फूटते नूर सी है तबीयत मेरी,
ख़याल भी रुका है कभी किसी के इख्तियार में

ग़र होता शायर ख़ुश अपने एक वजूद से,
तो तख़ल्लुस होता ही क्यूँ उसकी वसीयत-ए-दरकार में

बय़ार: Wind
मज़ामी: Opinions/topics
अबसार: Eyes
इख्तियार: influence/control/authority
तख़ल्लुस: pen name