Saturday, May 14, 2011

एक विश्व विजेता की ख़ुशी

(Alright, I'm back to doing what I love the most! I wrote this piece at the pre- semifinal time of the Cricket World Cup. Modified the initial draft today and publishing it only now. This is my first attempt at writing full length Hindustani poetry. I hope it is not too heavy a attack on the readers' reason or frame of mind!)

अभी कुछ वक़्त पहले किसी को भविष्यवाणी करते हुए सुना की इंडिया जीत रहा है

नयेपन का आडम्बर ओढ़ कर, नाम की डिगरी खरीदकर, तिरंगा सीने से जकड़े हुए
जब उस युवा को भी देखा तो लगा की इंडिया जीत रहा है.

दिन भर पत्थर तोड़ कर, मिली कौड़ियों को जोड़ कर, भाड़े के ट्रांसिस्टर को अपने कान से सटाए हुए
जब उस मजदूर को भी देखा तो लगा की इंडिया जीत रहा है.

बचपन को पीछे छोड़ कर, मासूमियत के टुकड़े जोड़ कर, ट्राफ्फिक लाइट में नन्हे हाथों से 'तिरंगा' बेचते हुए
जब उस बच्चे को भी देखा तो लगा की इंडिया जीत रहा है.

पुरखों की ज़मीन बेचकर, अपनों से नाता तोड़कर, गाँव की नरमी को शहर की गरमी से तौलते हुए
जब उस टी-शर्ट वाले को भी देखा तो लगा की इंडिया जीत रहा है.

खैर, इंडिया जीता भी, वो युवा चीखा भी,
वो मजदूर हँसा भी, वो बच्चा भी खिलखिलाया,
और वो किसान मुस्कुराया भी,
और 'खुशियों' के इस आलम में शायद इसलिए हर ज़हन को लगा की वाकई इंडिया जीत गया है.