Tuesday, October 4, 2011

ज़िद

जो होती इतनी ही ख़बर अपनी, तो क्यूँ ज़िद में ज़िन्दगी गवांते
ख़ाक पर सराबोर-ए-नूर ना होकर, सारे सितारों को ही तोड़ लाते

होते मंजिल की फ़िराक में हरदम, ख्वाहिशों के पुल बनाते
गर्द भरी तंग गलियों से भी हम मुरीद, उम्मीदों के कारवां ले जाते

कामयाबियों की इमारतों में बसते, दश्त पर नज़र ना फिराते
इश्क-ए-ख़याल की बेज़ा दुनिया में, क्यूँ शब्-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल बिताते

बचपन की उस अल्हड़ ख्वाहिश की तरह, बड़ा होने के सपने सजाते
क्यूँ अपने जवान अरमानों में, उसी बचपन को ढूँढ़ते रह जाते

किसी के इंतज़ार-ए-दीद में पड़ते, आसुओं से वुज़ू फ़रमाते
नारसाई के घुप्प अंधेरों में, हम क्यूँ चिताओं से रोशनी पाते

जो होती इतनी ही ख़बर अपनी, तो क्यूँ ज़िद में ज़िन्दगी गवांते
ख़ाक पर सराबोर-ए-नूर ना होकर, सारे सितारों को ही तोड़ लाते

Meanings:
ख़ाक : Ground/Earth
सराबोर-ए-नूर : bathed in light
गर्द : dirt
मुरीद : committed one(used as a pen name here)
दश्त : barren land
इश्क-ए-ख़याल : love of thought
बेज़ा : worthless/lifeless
शब्-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल : nights, days, months, years
इंतज़ार-ए-दीद : wait of a glimpse
वुज़ू : act of cleaning eyes and face before prayer
नारसाई : inaccessibility

(Another one of my attempts at poetry. Reader's comments are welcome. Please correct me if my Urdu usage is wrong, as I've been self-taught the language, and as is the case with languages, the grammar is the last thing one learns!)