Friday, November 25, 2011

एक कविता

कुछ छलकती सी, कभी बहती सी, कभी सिमटती सी,
ख़यालों को शब्दों से समझने की कोशिश में, एक कविता मेरे मन से निकल रही है

कब होता है इसका आना, क्यूँ होता है इसका आना,
अपने उद्गम के असमंजस में मुझे डाले हुए, एक कविता मेरे मन से निकल रही है

क्या इसके शब्द बेमानी हैं, क्या इसका वजूद असल में फ़ानी है,
या शायद रूह-ए-मिल्लत से मुझे जोड़ने की कोशिश में, एक कविता मेरे मन से निकल रही है

हम क्यूँ ये जीवन पाते हैं, और पाकर इसका क्या कर जाते हैं,
आत्म संवाद की इस अधूरी कोशिश में, एक कविता मेरे मन से निकल रही है

जब ये बातें मेरी खुद से हैं, तो फिर मुख़ातिब तुमसे क्यूँ हूँ मैं,
तुम्हे भी एक दिन समझाने की हसरत लिए, एक कविता मेरे मन से निकल रही है

आगे कुछ और क्या बोलूं मैं, नश्तर से तस्वीर क्या उकेरुं मैं,
बे-लहू एक कोरे पन्ने पर कुछ बनाने के लिए, एक कविता मेरे मन से निकल रही है