Friday, May 10, 2013

कवि


So this one is an attempt to understand how poets may be viewed from the perspective of a now scorned admirer. It may also be construed to be the standard view of people who don't have an appetite for poets or poetry.
Frankly speaking, I don't know on which side it leans.

कवि हैं ये, जीवित अजीवित का सूक्ष्मता से अध्ययन करते
अफसाने बुनते हुए हक़ीक़त-ए-आम के, सिर्फ नज़र नहीं एहसास को बयान करते ये

भावार्थी शब्दों की उलट पुलट से कुछ गहरा ज़ाहिर करते
और गहरा ग़र सोच में सुर्ख़ भी हुआ, तो यकीनन तुम्हारे ताज-ए-दिल पे दस्तक करते ये

जो नहीं समझे तुम कुछ, तो इस कमज़ोरी पर एक सूफ़ियाना सा अफसोस जताते
और इंसानी अक्ल की इस हद से मंत्रमुग्ध होकर,इस पर भी कुछ दार्शनीय सा लिखते ये

क्या आशा क्या जीवन और क्या हो निश्चय, इन चिरकालिक गुत्थियों पे मनन करते
अपने और तुम्हारे लिये नहीं तो अजन्मी पीढियों के लिये जीवन मार्ग प्रशस्त करते ये

सिसकते घनघोर अन्याय पर, विस्मित होते हर सामाजिक अध्याय पर
और अपने इन बुद्धिजीवी निष्कर्षों से तुमको यक़ीनन टटोलते ये

और कवि ही क्यूं, ये तो किसी भी भेस के मोहताज नहीं
तुम्हारे पथ प्रदर्शक, तुम्हारे अख़लाक़ के चिर रक्षक ये

Monday, July 30, 2012

लफ्ज़


मुझसे ज़्यादा ख़ुशनसीब तो मेरे ये लफ्ज़ हैं,
कल तेरे पहलू में ये ख़ुद को पायेंगे

तेरी नज़रें फिरेंगी इन पर हौले हौले,
तेरे चेहरे के तबस्सुम पे ये ग़श खायेंगे

क़ासिद के इंतेज़ार में जब होगा दिल टूटने को बेबस,
तेरे जवाबी लफ़्ज़ों में, हमजोलियों को मिल, शायद इतराएँगे

रखना इन्हें सम्हाल कर ऐ मेरे दोस्त,
कुछ वक़्त में बस ये ही तेरे काम आयेंगे

बदल जाऊं मैं भले ही कोई बहाना कर के,
बचे हुए, मेरे, शायद यही रह जायेंगे

Friday, January 20, 2012

क़ैद

अगर हमें शीशा ही दिखे हर दीदार में,
तो क्यूँ नयी सूरत दिखे हर अक्स-ए-रूह-ए-यार में

जिसे देखो वो नयी तसवीर बना कर बैठे मेरी,
पहचान जैसे ग़ुम सी गयी हो दलीलों के बाज़ार में

कहा भी की नुमाया है दिल-ए-हाल मेरा,
फिर क्यूँ हमेशा देखते हो मुझे माज़ी-ए-बय़ार में

क्यूँ समझते हो की क़ैद-ए-मज़ामी ही पाओगे मुझको,
इंसान हूँ, रुका हुआ अश्क नहीं अबसार में

बेसब्र होकर फूटते नूर सी है तबीयत मेरी,
ख़याल भी रुका है कभी किसी के इख्तियार में

ग़र होता शायर ख़ुश अपने एक वजूद से,
तो तख़ल्लुस होता ही क्यूँ उसकी वसीयत-ए-दरकार में

बय़ार: Wind
मज़ामी: Opinions/topics
अबसार: Eyes
इख्तियार: influence/control/authority
तख़ल्लुस: pen name

Friday, November 25, 2011

एक कविता

कुछ छलकती सी, कभी बहती सी, कभी सिमटती सी,
ख़यालों को शब्दों से समझने की कोशिश में, एक कविता मेरे मन से निकल रही है

कब होता है इसका आना, क्यूँ होता है इसका आना,
अपने उद्गम के असमंजस में मुझे डाले हुए, एक कविता मेरे मन से निकल रही है

क्या इसके शब्द बेमानी हैं, क्या इसका वजूद असल में फ़ानी है,
या शायद रूह-ए-मिल्लत से मुझे जोड़ने की कोशिश में, एक कविता मेरे मन से निकल रही है

हम क्यूँ ये जीवन पाते हैं, और पाकर इसका क्या कर जाते हैं,
आत्म संवाद की इस अधूरी कोशिश में, एक कविता मेरे मन से निकल रही है

जब ये बातें मेरी खुद से हैं, तो फिर मुख़ातिब तुमसे क्यूँ हूँ मैं,
तुम्हे भी एक दिन समझाने की हसरत लिए, एक कविता मेरे मन से निकल रही है

आगे कुछ और क्या बोलूं मैं, नश्तर से तस्वीर क्या उकेरुं मैं,
बे-लहू एक कोरे पन्ने पर कुछ बनाने के लिए, एक कविता मेरे मन से निकल रही है

Tuesday, October 4, 2011

ज़िद

जो होती इतनी ही ख़बर अपनी, तो क्यूँ ज़िद में ज़िन्दगी गवांते
ख़ाक पर सराबोर-ए-नूर ना होकर, सारे सितारों को ही तोड़ लाते

होते मंजिल की फ़िराक में हरदम, ख्वाहिशों के पुल बनाते
गर्द भरी तंग गलियों से भी हम मुरीद, उम्मीदों के कारवां ले जाते

कामयाबियों की इमारतों में बसते, दश्त पर नज़र ना फिराते
इश्क-ए-ख़याल की बेज़ा दुनिया में, क्यूँ शब्-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल बिताते

बचपन की उस अल्हड़ ख्वाहिश की तरह, बड़ा होने के सपने सजाते
क्यूँ अपने जवान अरमानों में, उसी बचपन को ढूँढ़ते रह जाते

किसी के इंतज़ार-ए-दीद में पड़ते, आसुओं से वुज़ू फ़रमाते
नारसाई के घुप्प अंधेरों में, हम क्यूँ चिताओं से रोशनी पाते

जो होती इतनी ही ख़बर अपनी, तो क्यूँ ज़िद में ज़िन्दगी गवांते
ख़ाक पर सराबोर-ए-नूर ना होकर, सारे सितारों को ही तोड़ लाते

Meanings:
ख़ाक : Ground/Earth
सराबोर-ए-नूर : bathed in light
गर्द : dirt
मुरीद : committed one(used as a pen name here)
दश्त : barren land
इश्क-ए-ख़याल : love of thought
बेज़ा : worthless/lifeless
शब्-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल : nights, days, months, years
इंतज़ार-ए-दीद : wait of a glimpse
वुज़ू : act of cleaning eyes and face before prayer
नारसाई : inaccessibility

(Another one of my attempts at poetry. Reader's comments are welcome. Please correct me if my Urdu usage is wrong, as I've been self-taught the language, and as is the case with languages, the grammar is the last thing one learns!)

Saturday, May 14, 2011

एक विश्व विजेता की ख़ुशी

(Alright, I'm back to doing what I love the most! I wrote this piece at the pre- semifinal time of the Cricket World Cup. Modified the initial draft today and publishing it only now. This is my first attempt at writing full length Hindustani poetry. I hope it is not too heavy a attack on the readers' reason or frame of mind!)

अभी कुछ वक़्त पहले किसी को भविष्यवाणी करते हुए सुना की इंडिया जीत रहा है

नयेपन का आडम्बर ओढ़ कर, नाम की डिगरी खरीदकर, तिरंगा सीने से जकड़े हुए
जब उस युवा को भी देखा तो लगा की इंडिया जीत रहा है.

दिन भर पत्थर तोड़ कर, मिली कौड़ियों को जोड़ कर, भाड़े के ट्रांसिस्टर को अपने कान से सटाए हुए
जब उस मजदूर को भी देखा तो लगा की इंडिया जीत रहा है.

बचपन को पीछे छोड़ कर, मासूमियत के टुकड़े जोड़ कर, ट्राफ्फिक लाइट में नन्हे हाथों से 'तिरंगा' बेचते हुए
जब उस बच्चे को भी देखा तो लगा की इंडिया जीत रहा है.

पुरखों की ज़मीन बेचकर, अपनों से नाता तोड़कर, गाँव की नरमी को शहर की गरमी से तौलते हुए
जब उस टी-शर्ट वाले को भी देखा तो लगा की इंडिया जीत रहा है.

खैर, इंडिया जीता भी, वो युवा चीखा भी,
वो मजदूर हँसा भी, वो बच्चा भी खिलखिलाया,
और वो किसान मुस्कुराया भी,
और 'खुशियों' के इस आलम में शायद इसलिए हर ज़हन को लगा की वाकई इंडिया जीत गया है.